गुरुवार, 15 नवंबर 2007

कास्ट अवे - you have to breath until u get a way.


आम तौर पर हम सनचार के बारे मे किताबो  मे ही पढते है उससे हि हमे पता चलता है कि आखिर मनुष्य ने भाषा का आविष्कार क्यु किया . लेकिन अगर आप को याद हो तो इन कितबो मे अनदरलाइन करके बताया जाता है कि हम ९७ % संचार नान वर्बल करते है. ऐसे मे कै बार लगता है कि भला फ़िर इस ३ % सन्च्हर को लेकर इत्ना हो हल्ल क्यु मचाया जा है. हम ९७ % के साथ भि तो अपना काम चला सकते है . सवाल सही भी है . लेकिन इसका जवाब है नहि . अब इसके लिये मै आपको कोइ लम्बा चौड़ा भाषण नही दूगा. बल्कि आपको एक छोटा सा सुझाव दूगा. सुझाव भी ऐसा जिसे सुनकर यकिनन हर भारतीय खुश हुये बिन नहि रह पायेगा. आपको करना बस इत्ना है कि एक फ़िल्म देखनी है-कास्ट अवे. और दोस्तो मेरा वादा रहा आपको अपना जवाब जरुर मिलेगा. टाम हैन्क्स के बेहतरीन अभिनय से सजी आस्कर विजेता यह फ़िल्म हमारी आजकल के दौर से हि शुरु होती है लेकिन जल्दी ही हमारे आज से निकलकर वहा चली जाती है जहा से हम सभी निकले थे. मानव कि अपनी कमजोरिया है और अप्नी ताक्ते है. वो बदे से बदा तूफ़ान सह सकता है . अकल्पनीय चिजो क निर्मन कर सकता है . लेकिन किसी च्होती सी वजह के चलते बिखर सकता है. इस्मे देखा जाये तो उसका कोइ दोष नही है. हमरी बनावट हि ऐसी है. स्वयम मे हम आकर्षण और प्रतिकर्षण के नियमो से बुरी तरह बन्धे है. जब जिस चीज ने हमे आकृष्ट किया हमने उसे हासिल करने के लिये सातों जहान एक कर दिये और जब वहि आकर्षण खत्म हुआ. तो सालो से सहेजी चीज पल भर मे खाक कर दी जाती है. यह आकर्षण हि है जो हमे जिन्दा रखता है और ये प्रतीकर्षण हि है जो हमे मरने नही देता.हमे अपने लिये नये रास्ते तलाशते रहते है. एक उम्मीद मे कि हो ना हो आने वाल कल खुद मे जरुर कु्छ बेहतर समेटे होगा. यह फ़िल्म मनुष्य के इतिहास का जीता जागता उदाहरन है.और क्या खूब उदाहरन है. अकेलेपन के साथ जिया जा सकता है बशरते उसे आपने खुद बनाया हो वो सिर्फ़ आपके आसपास फ़ैला हो लेकिन यही अकेलापन जब हर तरफ़ फ़ैल जाता है तब मुश्किले खडी हो जती है.जब इसका चुनाव आप करते है तब आप चुनव करते है किसी से नही बोलने का लेकिन सबको सुनने क जब आप कि इच्छा हो तब. लेकिन अगर आप्से चुनाव क यह अधिकर छीन लिया जाये तब क्या होग..एक दिन ..दो दिन...तीन दिन...आपक अहम आप्को कमजोर नही होने देग..इस्के बाद....आप दीवरो के झरोखो से दूसरो कि अवाजे सुनने के लिये परेशान हो उठेगे.और दीवरो के कान बन्कर रह जायेगे. हमारे लिये हर चीज जरुरी है हसना रोना चिलाना गाना यहाँ तक कि लड्ना भी....अखिर इन सब को परत दर परत जमा कर के ही तो हम अप्नी यादो क खाता भरते है वर्ना भागते हुये समय से हमे हासिल हि क्या होता है. अगर आप्को अब भी मेरी बातो मे यकीन नही हो रहा है तो एक बार हि सही किरये पर हि सही कास्ट अवे देखिये जरूर. और खुद को नायक कि जगह रखकर देखिये . तब आपको पता चलेगा कि अपने आप से रूबरू होना इत्ना आसान नही. अपनी कम्जोरियो को जीतना इत्ना मुश्किल भी नही.

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