हर दौर में समाज अपने लिए नए कायदे कानून बनता है , जिन पर सामाजिक मूल्यों व परम्पराओ का बोझ टिका होता है। ये परम्पराये 'सर्वमान्य' होकर भी 'सर्व्हित' में नही होती। इसलिए चंद फसलों पर ऊँची इमारतों और टूटी झोपडियों के पाए जाने का विरोधाभास पनपता है.जब दो विरोधाभास आपस में टकराते है तो ऐतिहासिक घटनाओ का जन्म होता है.और ये घटनाये ही इतिहास को जन्म देती है। साहित्य इस इतिहास को ज्यों का त्यों पन्नों में संभालता रहता है।
भारतीय समाज कि सरंचना अत्यंत जटिल है। यह बहुभाषी, बहु धर्मी, धर्म निरपेक्ष राष्ट्र अपने सीने में न जाने कितने झाख्म छुपाये है। गुजरात से मणिपुर, कश्मीर से कन्याकुमारी तक न जाने कितनी जोड़ गांठे हुई है तब जाकर भारत 'एक' बना है। यहाँ तक कि यात्रा में इसकी आत्मा पर लगे झाख्मो कि लंबी फेहरिस्त है। धर्म के नम पर आम आदमी पर कितने जुल्म हुए इसकी गिनती नही। ब्राहमण वाद ने गरीब व दबे कुचले लोगो को हाशिये पर ला खाद किया। सदियों तक अछूत मंदिर कि चौखट के बाहर खडे हो कर पूछता रह उसे अछूत किसने बने है । भगवान ने या 'भगवन के भक्तो' ने ।
भारत में असगर अछूत होना पाप था तो गरीब होना अभिशाप । आर्थिक दृष्टि से निम्न तबके ने ज़मिदारो के शोषण को पीढ़ी दर पीढ़ी भोग। 'नारी' जिसे भारत माता का दर्जा दिया गया है, उसे 'धर्म' के चौखट कि भीतर बंद कर दिया गया, बाहर निकली तो सटी कर दी गयी। अपने अधिकार मांगे अपने फैसले किये तो बहाया के खिताब से नवाजी गयी। और भी न जाने क्या क्या.........
साहित्य ने ऐसे हर मुद्दे को गहरे से छुआ है। समाज के नंगे यथार्थ का चित्रण किताबो से निकलकर परदे पर आ गया। और सिनेमा समाज का दर्पण बन गया। साहित्य और समाज के इस गठजोड़ ने समाज के चेहरे पर चढ़े बदरंग मुखौटे को उतार फेका।
मंगलवार, 6 नवंबर 2007
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