बुधवार, 14 नवंबर 2007

हासिल - हम बच गए तो तुम कम कर दिए जाओगे !


हिन्दी सिनेमा मैं कई बार हिट्स ऎंड सुपर्हिट्स के बीच ऐसी फिल्म आती रहती है जिनका बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भले ही हौसफुल लेवल का न हो लेकिन फिल्म का लेवल जरूर उनसे बहुत ऊपर का होता है। मिसाल के तौर पर हासिल को ही ले लीजिये । तिग्मांशु धुलिया ने छात्र राजनीती की परते खोलते हुए उसके सत्ता कि गलियों से सम्बन्धों का बेबाक फिल्मांकन किया है। विद्यालय शिक्षा और ज्ञान का stal मन जाता है लेकिन जब इन सब के ऊपर राजनीती हावी होने लगती है तब रणविजय और गौरी शंकर पैदा हो जाते हैं। जिनके लिए कालेज कि कैंटीन उनके निजी कार्यालय बन जाते हैं। हमारे देश में आजकल अधिकतर कॉलेजों में यही हो रहा है.फिल्म का पहला दृश्य भी इसकी गवाही देता है। राजनीती कि दुकान चलाने वाले ये राजकुवर हर दिन किसी को कम करने ki firak में रहते हैं.ताकि एक तो इनका नम लोगो कि जुबान पर रहे और अपने जैसो के बीच इनकी इज्जत भी बनी रहे। हासिल में कोई स्टार नही है लेकिन अभिनेता जरुर है जिनका अभिनय आपको अपनी जगह से उठने नही देगा। इरफान खान और आशुतोष राणा ने रणविजय और गौरीशंकर के रोल में खुद को परफेक्ट साबित किया है । कथानक इलाहबाद के आस पास घूमता है और वहा कि स्थानीय भाषा का प्रयोग बडे करीने से किया गया है। उदाहरण देखिए गौरीशंकर - और सुनो रणविजय इलेक्शन तक इधर तुम्हारी परछाई भी नही चाहिऐ नही तो॥ रणविजय -तो ...तो का होगा... गौरीशंकर - नही तो कम कर दिए जाओगे ,दो चार लौंडे आके गाना गयेगे चलते चलते मेरे गीत याद रखना ..दो मिनट का मौन होगा और का...तुम्हरी याद में नेशनल हलिदे होगा का बे... इरफान हर सीन मी कमाल है जब भी आये बस छ गए। कहानी कोई आर्ट सिनेमा नही है लेकिन हाँ इसे कमार्सिअल भी नही कहेगे बस यू कहिये कि तिग्मांशु में इंटरवल से पहले छात्र राजनीती और विधानसभा कि गलियों के बिच कैमरे को रखकर छोड़ दिया है और जो भी इसकी जड़ मी आया उसे बिना कट किये प्रस्तुतु किया है। यकीनन ऐसे मुद्दे काफी कम उठाए गए है और इन पर अभी और कम करने किजरुरत है । यह फिल्म समस्या को तो बताती है लेकिन कोई समाधान नही पेस करती है। कालेज एक हर युवा के जीवन का वह समय होता है जब वह पहली बार आज़ादी पता हिया अपने आसपास मी घुलना शुरू करता है। उसके पास साड़ी दुनिया को जितने ki ताकत होती है । लेकिन इन सबके लिए जरुरी है उसका सही दिशा बढ़ना और सही लोगो को हासिल करना । फिल्म का सर यही है। और अभिमन्यु से बेहतर भला इसे कौन जन सकता है जिसकी एक गलती ने उसकी जिन्दगी ki पटरी ही पलट दी। हासिल में भले ही रणविजय को कुछ न हासिल होता हो। लेकिन इतना तो यह फिल्म कह ही जाती है ki अगर जल्दी ही सबकुछ बदलेगा नही तो वो दिन भी दूर नही जब गौरीशंकर और रणविजय के पास सबकुछ होगा और हमारे हिस्से में कुछ नही ।

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