सिनेमा के अदभुद संसार में आपका स्वागत है . यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ वास्तविकता यथार्थ से ज्यादा स्पस्ट नजर अति है। यहाँ शब्दों के मुलम्मे सिर्फ सच को छुपाने के लिए नहीं बल्कि उसे सामने लाने के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं। सिनेमा कि इस विशाल दुनिया में शामिल होने कि तमन्ना किसकी नही होती । ये और बात है कि हर कोई इसमे शामिल नही हो पता लेकिन हाँ सिनेमा हम सबकी जिन्दगी में किसी न किसी रुप में शामिल है। कभी आनंद बनकर कभी देवदास बनकर,कभी पाकीजा बनकर तो कभी ड्रीमगर्ल बनकर।
यू तो सिनेमा को कांच के रंगीन टुकडों को सहेजने वाला, सपनों का सौदागर, और ऐसी ही नाजाने कितनी उपाधियों से नवाजा गया है , लेकिन वास्तव में जिस तरह हर चीज के दो पहलू होते हैं सिनेमा के भी दो पहलू हैं। सिनेमा पर यह आरोप है कि उसने नयी पीढ़ी को अपने मोह पाश मी बांधकर गुमराह किया है तो ये भी नही भूलना चाहिऐ कि जब जब समाज में आदर्शो के कमी हुई है या सच का गला घोटा गया है सिनेमा सवार्धिक सशक्त माध्यम बनाकर सामने आया है। कर्मिशैल सिनेमा और अर्तिस्तिक सिनेमा का संगम सिनेमा को मात्र मनोरंजन कि भूल भुलैया से दूर लेजता है। अतीत में जहाँ एक तरफ सत्यजीत राय थे,गुरुदत्त,ऋत्विक घटक,बिमल राय,ऋषिकेश, और बी आर चोपडा,नासिर हुसैन, थे वही आज उसी परंपरा को आदित्य चोपडा,कारन जौहर,राकेश रौशन,और मनीष झा,मधुर भंडारकर,संजय लीला भंसाली, आगे बड़ा रहे हैं।
कुल मिलकर कम से कम शब्दों मी कहा जाये तो सिनेमा जादू की वह पिटारी हैं जिसे जिसने जिस मन से खोला,जिन आंखो से देखा,उसे उसके मन का मिल और उसने वही देखा जो उसने देखन चाह। जादू कि यह पिटारी हर शुक्रवार को खुलती है। और गली गली नुक्कड़ में फिल्मो के पोस्टर पढ़ने वाले लोग और हर सुबह टाकीज के शो कि तिमिंग देखने वाले हम लोग हर हफ्ते इंतजार करते हैं कि इस बार इस जादू कि पिटारी में क्या हैं ?
शुक्रवार, 2 नवंबर 2007
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