मुन्नाभाई मे उनकी और अरशद वारसी का कांबिनेशन कमाल का था.अलहदा पतकथा और सधा हुआ निर्देशन साथ मे बेहतरीन अभिनय - कुल मिलाकर एक संपूर्ण फ़िल्म जिसे देश ही नही विदेश मे भी जमकर सराहा गया.फ़िल्म भले ही हास्य प्रधान थी लेकिन इसने गांधी जी के आदर्शो को किताबो से निकाल्कर लोगो के बीच ला खडा किया.फ़िल्म के लिये एक बार फ़िल्म संजय को फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड मिला.लेकिन इस बार कैटेगरी थी-बेस्ट कामेडी एक्टर.
अब जब इस तरफ़ सब कुछ सही चल रहा था,संजय को एक बार फ़िर १४ साल पहले किये गुनाह से दो चार होना पडा.टाडा कोर्ट ने मुंबई ब्लास्ट मे आरोपियो के मामलो की सुन्वाई पूरी की और ३१ जुलाई २००७ को टाडा कोर्ट के जज पीडी कोडे ने उन्हे ६ साल की कैद की सजा सुनाई.और संजय दत्त एक बार फ़िर सलाखो के उस पार पहुच गये.जहा पहुचने का रास्ता उन्होने अपने ही हाथो १४ साल पहले बनाया था.संजय की सजा पर मीडिया मे फ़िल्म इंदस्ट्री मे,और आम जनता मे भी जमकर बहस हुई.सजा सही है या नही,सही है तो क्या १४ साल पहले के गुनाह की इतने सालो बाद इतनी कडी सजा उचित है.और भी हजारो बाते हवा मे तैर रही थी.लेकिन न्याय तो न्याद है वह यह सब नही देखता. उसके लिये जुर्म और अपराधी के बीच सबूतो की चारदीवारी होती है जिसके पार वह नही देख सकता.जज पीडी कोडे ने भी माना कि व्यक्तिगत तौर पर वे संजय दत्त की बेहद इज्जत करते हैं और उनके अभिनय के मुरीद है लेकिन कानून की द्रष्टि मे उन्होने जो अपराध किया है यह उसकी न्यूनतम सजा है और उन्होने वही किया. जो न्याय के सिंहासन पर बैठ्कर उन्हे करना चाहिये था.उसका मान उनके लिये सबसे पहले था बाकी सब बाद मे.
कुल मिलाकर संजय पर अभी भी इंडस्त्री के तकरबीन १.५ बिलिअन रुपये लगे है. अलिबाग,महबूबा,अन्थोनी कौन था, मुन्नाभाई चले अमेरिका,जैसी कई बडे बैनरो की फ़िल्मे उनके इंतजर मे हैं. फ़िल्हाल ताजा खबर यही है कि आज तारीख २९ नवंबर को उन्हे जमानत मिल गयी है. और यकीनन इससे इन फ़िल्मो के निर्माताओ ने चैन की सांस ली होगी.चैन की सांस तो संजय ने भी ली होगी.लेकिन ये शायद उन्हे भी नही पता होगा कि आखिर कब तक यह सांस उनके साथ रहेगी. संजय का जीवन उतार चढावो से भरा हुआ है.वे स्वयं मे चलते फ़िरते घटनाचक्र बन गये हैं जिनकी स्टोरी मे बालीवुड की फ़िल्मो के साए तत्व मौजूद हैं. और उनकी ही फ़िल्म कांटे का यह गीत उन पर एक्दम फ़िट बैथता है..जाने क्या होगा रामा रे ..जाने क्या होगा मौला रे....
संजय ने जीवन मे लगातार संघर्ष किया है. यही नही इन सबके चलते वे अत्यंत सौम्य और संवेदन्शील बन गये है.और दर्द से मुक्ति के लिये हास्य की दवा की खोज कर ली है .उनका हास्य्बोध उन्हे शक्ति देता है और जीवन को गति प्रदान करता है.इसके चलते हर बार वे पहले से बेहतर निखर कर आये हैं.देखना यह है कि इस बार संजय अपने चाहने वालो को क्या खास पेश करते हैं....
गुरुवार, 29 नवंबर 2007
संजय दत्त - क्या खोया क्या पाया - पार्ट 2
अब इसे संयोग ही कहेंगे कि इसी साल खलनायक फ़िल्म मे परदे का नायक असल मे खलनायक बन गया. १९९३ मुंबई ब्लास्ट मामले मे संजय पर हादसे के मुख्य आरोपी अबु सलेम की मदद करने का आरोप लगा.अवैध रूप से AK 56 रखने व बाद मे उसे नष्ट करने के मामले मे टाडा कोर्ट मे उनके खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया.संजय का कैरियर इससे पहले की अपनी ऊचाईयों को छू पाता उस पर ब्रेक लग गये.ये प्रकरण अभी खत्म नही हुआ था. बस कह सक्ते है कि पिता के प्रयासो व रसूख के चलते उन्हे बाकी आरोपियो की जगह कही अधिक सुविधाये नसीब हुई.
जेल से निकलने के बाद संजय संजू बाबा बन गये और उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ़ हो गया. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. एक बार फ़िर निजी जीवन की परेशानिया उनके सामने आकर खडी हो गयी.पत्नी रिचा शर्मा जिससे उन्होने १९८७ मे शादी की थी उन्हे कैंसर हो गया.और वे अलग हो गये.रिचा अपनी पुत्री त्रिश्ना के साथ अमेरिका अपनी मां के यहा चली गयी.१९९६ मे उन्की मौत हो गयी और फ़िर संजय को अपनी पुत्री के लिये अप्ने ससुराल वालो से लड़्ना पडा. जिसमे वे हार गये.
बहरहाल उनके फ़िल्मी कैरियर पर वापस आते हैं.... रामगोपाल वर्मा ने १९९८ मे उन्हे दौड़ मे काम करने का मौका दिया. जिसने उनके लिये नयी फ़िल्मो के द्वार खोल दिये . इसके बाद संजय के भाग्य का सितारा चमका और उन्होने एक ही साल १९९९ मे हिट फ़िल्मो की हैट्रिक लगायी. इसमे दाग - द फ़ायर,हसीना मान जायेगी,और वास्तव शामिल हैं.महेश मांजरेकर की फ़िल्म वास्तच मे अभिनय के लिये इन्हें बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.यह समय संजय के लिये काफ़ी अच्छा साबित हुआ.२००१ मे उन्होने अपनी लंबे समय की गर्ल्फ़्रेंड रिया से वैलेंटाइन डे पर ताज होतल मे शादी कर ली.यह और बात है की आगे चलकर दोनो का तलाक हो गया.रिया ने संजय को तब मानसिक और आत्मिक सहारा दिया था जब उन्हे उन्की सबसे ज्यादा जरूरत थी.शायद उन्हे लगा कि रिया के साथ कम से कम उनका टूटे दिल को और दर्द नही सहना पडेगा.लेकिन यह बस भावनाओ का कमजोर पुल साबित हुआ. जो जरा सा अधिक बोझ होने पर बिखर गया, टुकडे टुकडे हो गया.आखिर शादी सिर्फ़ सहारे का नाम तो नही ही है.
संजय ने इस बीच अपने मित्र संजय गुप्ता के साथ मिल्कर white feathers नाम की प्रोड्क्शन कंपनी की स्थापना भी की. और कांटे,मुसाफ़िर,शूट आउट एट लोखंडेवाला जैसी हिट फ़िल्मो का निर्माण किया. २००३ मे संजय को लेकर राज्कुमार हिरानी ने 'मुन्ना भाई MBBS' बनायी.जिसकी अपार सफ़लता ने संजू बाबा को एक नयी पहचान दी.उनकी गांधीगिरी ने लोगो का दिल जीत लिया.
जेल से निकलने के बाद संजय संजू बाबा बन गये और उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ़ हो गया. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. एक बार फ़िर निजी जीवन की परेशानिया उनके सामने आकर खडी हो गयी.पत्नी रिचा शर्मा जिससे उन्होने १९८७ मे शादी की थी उन्हे कैंसर हो गया.और वे अलग हो गये.रिचा अपनी पुत्री त्रिश्ना के साथ अमेरिका अपनी मां के यहा चली गयी.१९९६ मे उन्की मौत हो गयी और फ़िर संजय को अपनी पुत्री के लिये अप्ने ससुराल वालो से लड़्ना पडा. जिसमे वे हार गये.
बहरहाल उनके फ़िल्मी कैरियर पर वापस आते हैं.... रामगोपाल वर्मा ने १९९८ मे उन्हे दौड़ मे काम करने का मौका दिया. जिसने उनके लिये नयी फ़िल्मो के द्वार खोल दिये . इसके बाद संजय के भाग्य का सितारा चमका और उन्होने एक ही साल १९९९ मे हिट फ़िल्मो की हैट्रिक लगायी. इसमे दाग - द फ़ायर,हसीना मान जायेगी,और वास्तव शामिल हैं.महेश मांजरेकर की फ़िल्म वास्तच मे अभिनय के लिये इन्हें बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.यह समय संजय के लिये काफ़ी अच्छा साबित हुआ.२००१ मे उन्होने अपनी लंबे समय की गर्ल्फ़्रेंड रिया से वैलेंटाइन डे पर ताज होतल मे शादी कर ली.यह और बात है की आगे चलकर दोनो का तलाक हो गया.रिया ने संजय को तब मानसिक और आत्मिक सहारा दिया था जब उन्हे उन्की सबसे ज्यादा जरूरत थी.शायद उन्हे लगा कि रिया के साथ कम से कम उनका टूटे दिल को और दर्द नही सहना पडेगा.लेकिन यह बस भावनाओ का कमजोर पुल साबित हुआ. जो जरा सा अधिक बोझ होने पर बिखर गया, टुकडे टुकडे हो गया.आखिर शादी सिर्फ़ सहारे का नाम तो नही ही है.
संजय ने इस बीच अपने मित्र संजय गुप्ता के साथ मिल्कर white feathers नाम की प्रोड्क्शन कंपनी की स्थापना भी की. और कांटे,मुसाफ़िर,शूट आउट एट लोखंडेवाला जैसी हिट फ़िल्मो का निर्माण किया. २००३ मे संजय को लेकर राज्कुमार हिरानी ने 'मुन्ना भाई MBBS' बनायी.जिसकी अपार सफ़लता ने संजू बाबा को एक नयी पहचान दी.उनकी गांधीगिरी ने लोगो का दिल जीत लिया.
संजय दत्त - क्या पाया क्या खोया
स्टार एक्टर सुनील दत्त और मदर इंडिया यानि नरगिस की संतान संजय दत्त को उन्के पिता ने १९८१ मे राकी के जरिये बडे परदे पर लांच किया था.ये और बात है की रगो मे अभिनय का खानदानी खून होने के बावजूद उनकी शुरुआत अच्छी नही रही. और विधाता १९८२,हथियार १९८९,नाम १९८६,जैसी फ़िल्मे कुछ खास असर नही छोड पायी. इसके पीछे क्या वजह रही यह कहना थोडा सा मुश्किल है क्योकि अभिनय जगत से तो वे बच्पन से ही जुडे थे.और सुनील दत्त की फ़िल्म रेशमा और शेरा मे एक कव्वाली सिंगर के रूप मे काम भी कर चुके थे.कुछ लोग इस्की वजह उनके निजी जीवन को मानते है.
संजय दत्त की पर्सनल लाइफ़ हमेशा से ही विवादो मे रही है.जब वे हाईस्कूल मे थे तभी ड्रग के शिकार हो गये.इसके चलते उन्की मां नरगिस की तबियत खराब रहने लगी.वे पहले से ही कैंसर से जूझ रही थीं. ऐसे मे अपने बेटे की हरकतो को बर्दास्त नही कर पायी.और संजय दत्त की पहली फ़िल्म रिलीज होने से पहले ही इस दुनिया से चल बसी.बाद मे सुनील दत्त ने संजय को टेक्सास के रिहैबिटेशन सेंटए भेजा.वहा से वापस आने के बाद संजय ने फ़िर से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की.९० के दशक के शुरुआत मे उन्की फ़िल्म 'सड़्क' [१९९१] आयी. जो उनके कैरियर के लिये टर्निंग प्वाइंट साबित हुइ.इस फ़िल्म ने उन्हे अभिनय जगत मे सडक से उठाकर सिंहासन तो नही पर हा बेहतर जगह मे पहुचा दिया.इसी साल एक और सुपर हिट फ़िल्म संजय दत्त के हिस्से मे आई साजन. जिसके लिये उन्हे पहली बार बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.
वैसे वे इस मुकाम तक काफ़ी पहले ही पहुच सकते थे.१९८३ मे जब सुभाष घई हीरो बना रहे थे तो संजय उन्की पहली पसंद थे लेकिन ड्रग मे उन्की संलिप्तता को देखते हुये उन्होने उन्की जगह जैकी श्राफ़ को मौका दिया.बाद मे हीरो सुपर हिट हुई. और फ़िल्म इंडस्ट्री को जैकी के रूप मे एक नया रफ़ एंड टफ़ हीरो मिल गया. सुभाष घई ने संजय को अपनी बहुचर्चित और विवादास्पद फ़िल्म खलनायक मे मौका दिया.जो एक बडी हिट साबित हुई. विशेष रूप से इसके एक गीत विशेष ने सबका ध्यान खीचा.यहा तक की सेंसर बोर्ड भी बच नही पाया.आकाश्वाणी से अब भी इस गीत का प्रसारण नही किया जाता,क्योकि यह सरकार द्वारा तय मापदंडो मे खरा नही उतरता.वैसे इस फ़िल्म की नायिका डांस क्वीन माधुरी दीक्शित थी.इनके साथ संजय ने १९८९ मे थानेदार फ़िल्म की थी.उस समय दोनो के रोमांस के किस्से खूब मशहूर हुये थे.ये और बात है की इस रोमांस का सारांश 'कुछ नही' निकला.
संजय दत्त की पर्सनल लाइफ़ हमेशा से ही विवादो मे रही है.जब वे हाईस्कूल मे थे तभी ड्रग के शिकार हो गये.इसके चलते उन्की मां नरगिस की तबियत खराब रहने लगी.वे पहले से ही कैंसर से जूझ रही थीं. ऐसे मे अपने बेटे की हरकतो को बर्दास्त नही कर पायी.और संजय दत्त की पहली फ़िल्म रिलीज होने से पहले ही इस दुनिया से चल बसी.बाद मे सुनील दत्त ने संजय को टेक्सास के रिहैबिटेशन सेंटए भेजा.वहा से वापस आने के बाद संजय ने फ़िर से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की.९० के दशक के शुरुआत मे उन्की फ़िल्म 'सड़्क' [१९९१] आयी. जो उनके कैरियर के लिये टर्निंग प्वाइंट साबित हुइ.इस फ़िल्म ने उन्हे अभिनय जगत मे सडक से उठाकर सिंहासन तो नही पर हा बेहतर जगह मे पहुचा दिया.इसी साल एक और सुपर हिट फ़िल्म संजय दत्त के हिस्से मे आई साजन. जिसके लिये उन्हे पहली बार बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.
वैसे वे इस मुकाम तक काफ़ी पहले ही पहुच सकते थे.१९८३ मे जब सुभाष घई हीरो बना रहे थे तो संजय उन्की पहली पसंद थे लेकिन ड्रग मे उन्की संलिप्तता को देखते हुये उन्होने उन्की जगह जैकी श्राफ़ को मौका दिया.बाद मे हीरो सुपर हिट हुई. और फ़िल्म इंडस्ट्री को जैकी के रूप मे एक नया रफ़ एंड टफ़ हीरो मिल गया. सुभाष घई ने संजय को अपनी बहुचर्चित और विवादास्पद फ़िल्म खलनायक मे मौका दिया.जो एक बडी हिट साबित हुई. विशेष रूप से इसके एक गीत विशेष ने सबका ध्यान खीचा.यहा तक की सेंसर बोर्ड भी बच नही पाया.आकाश्वाणी से अब भी इस गीत का प्रसारण नही किया जाता,क्योकि यह सरकार द्वारा तय मापदंडो मे खरा नही उतरता.वैसे इस फ़िल्म की नायिका डांस क्वीन माधुरी दीक्शित थी.इनके साथ संजय ने १९८९ मे थानेदार फ़िल्म की थी.उस समय दोनो के रोमांस के किस्से खूब मशहूर हुये थे.ये और बात है की इस रोमांस का सारांश 'कुछ नही' निकला.
गुरुवार, 22 नवंबर 2007
तलाश नये मित्रो की
हिन्दी ब्लोगिंग संसार मे हमने भी अपने कुछ चिठ्ठो को शामिल किया है. यह भी अन्य की तरह अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति का माध्य्म बनेगे.बस फ़र्क इतना हिअ कि मै इन्हे एक निश्चित दायरे मे बांधना रहा हू. इसके चलते मैने तीन अलग अलग विष्यो पर तीन ब्लोग बनाये है पहला समाज से जुडे मुद्दो पर आधारित है.दूसरा साहित्य की उथल पुथल से और तीसरा सिनेमा की अदभुद दुनिया से. मेरा यह पहला प्रयास है और मै चाहूगा इसमे मुझे आप सभी का सहयोग प्राप्त हो जो पहले से इन विषयो पर गंभीर लेखन कर रहे है. आप सभी की टिप्पणियो और सुझावो का स्वागत है.
गुरुवार, 15 नवंबर 2007
कास्ट अवे - you have to breath until u get a way.

आम तौर पर हम सनचार के बारे मे किताबो मे ही पढते है उससे हि हमे पता चलता है कि आखिर मनुष्य ने भाषा का आविष्कार क्यु किया . लेकिन अगर आप को याद हो तो इन कितबो मे अनदरलाइन करके बताया जाता है कि हम ९७ % संचार नान वर्बल करते है. ऐसे मे कै बार लगता है कि भला फ़िर इस ३ % सन्च्हर को लेकर इत्ना हो हल्ल क्यु मचाया जा है. हम ९७ % के साथ भि तो अपना काम चला सकते है . सवाल सही भी है . लेकिन इसका जवाब है नहि . अब इसके लिये मै आपको कोइ लम्बा चौड़ा भाषण नही दूगा. बल्कि आपको एक छोटा सा सुझाव दूगा. सुझाव भी ऐसा जिसे सुनकर यकिनन हर भारतीय खुश हुये बिन नहि रह पायेगा. आपको करना बस इत्ना है कि एक फ़िल्म देखनी है-कास्ट अवे. और दोस्तो मेरा वादा रहा आपको अपना जवाब जरुर मिलेगा. टाम हैन्क्स के बेहतरीन अभिनय से सजी आस्कर विजेता यह फ़िल्म हमारी आजकल के दौर से हि शुरु होती है लेकिन जल्दी ही हमारे आज से निकलकर वहा चली जाती है जहा से हम सभी निकले थे. मानव कि अपनी कमजोरिया है और अप्नी ताक्ते है. वो बदे से बदा तूफ़ान सह सकता है . अकल्पनीय चिजो क निर्मन कर सकता है . लेकिन किसी च्होती सी वजह के चलते बिखर सकता है. इस्मे देखा जाये तो उसका कोइ दोष नही है. हमरी बनावट हि ऐसी है. स्वयम मे हम आकर्षण और प्रतिकर्षण के नियमो से बुरी तरह बन्धे है. जब जिस चीज ने हमे आकृष्ट किया हमने उसे हासिल करने के लिये सातों जहान एक कर दिये और जब वहि आकर्षण खत्म हुआ. तो सालो से सहेजी चीज पल भर मे खाक कर दी जाती है. यह आकर्षण हि है जो हमे जिन्दा रखता है और ये प्रतीकर्षण हि है जो हमे मरने नही देता.हमे अपने लिये नये रास्ते तलाशते रहते है. एक उम्मीद मे कि हो ना हो आने वाल कल खुद मे जरुर कु्छ बेहतर समेटे होगा. यह फ़िल्म मनुष्य के इतिहास का जीता जागता उदाहरन है.और क्या खूब उदाहरन है. अकेलेपन के साथ जिया जा सकता है बशरते उसे आपने खुद बनाया हो वो सिर्फ़ आपके आसपास फ़ैला हो लेकिन यही अकेलापन जब हर तरफ़ फ़ैल जाता है तब मुश्किले खडी हो जती है.जब इसका चुनाव आप करते है तब आप चुनव करते है किसी से नही बोलने का लेकिन सबको सुनने क जब आप कि इच्छा हो तब. लेकिन अगर आप्से चुनाव क यह अधिकर छीन लिया जाये तब क्या होग..एक दिन ..दो दिन...तीन दिन...आपक अहम आप्को कमजोर नही होने देग..इस्के बाद....आप दीवरो के झरोखो से दूसरो कि अवाजे सुनने के लिये परेशान हो उठेगे.और दीवरो के कान बन्कर रह जायेगे. हमारे लिये हर चीज जरुरी है हसना रोना चिलाना गाना यहाँ तक कि लड्ना भी....अखिर इन सब को परत दर परत जमा कर के ही तो हम अप्नी यादो क खाता भरते है वर्ना भागते हुये समय से हमे हासिल हि क्या होता है. अगर आप्को अब भी मेरी बातो मे यकीन नही हो रहा है तो एक बार हि सही किरये पर हि सही कास्ट अवे देखिये जरूर. और खुद को नायक कि जगह रखकर देखिये . तब आपको पता चलेगा कि अपने आप से रूबरू होना इत्ना आसान नही. अपनी कम्जोरियो को जीतना इत्ना मुश्किल भी नही.
बुधवार, 14 नवंबर 2007
हासिल - हम बच गए तो तुम कम कर दिए जाओगे !

हिन्दी सिनेमा मैं कई बार हिट्स ऎंड सुपर्हिट्स के बीच ऐसी फिल्म आती रहती है जिनका बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भले ही हौसफुल लेवल का न हो लेकिन फिल्म का लेवल जरूर उनसे बहुत ऊपर का होता है। मिसाल के तौर पर हासिल को ही ले लीजिये । तिग्मांशु धुलिया ने छात्र राजनीती की परते खोलते हुए उसके सत्ता कि गलियों से सम्बन्धों का बेबाक फिल्मांकन किया है। विद्यालय शिक्षा और ज्ञान का stal मन जाता है लेकिन जब इन सब के ऊपर राजनीती हावी होने लगती है तब रणविजय और गौरी शंकर पैदा हो जाते हैं। जिनके लिए कालेज कि कैंटीन उनके निजी कार्यालय बन जाते हैं। हमारे देश में आजकल अधिकतर कॉलेजों में यही हो रहा है.फिल्म का पहला दृश्य भी इसकी गवाही देता है। राजनीती कि दुकान चलाने वाले ये राजकुवर हर दिन किसी को कम करने ki firak में रहते हैं.ताकि एक तो इनका नम लोगो कि जुबान पर रहे और अपने जैसो के बीच इनकी इज्जत भी बनी रहे। हासिल में कोई स्टार नही है लेकिन अभिनेता जरुर है जिनका अभिनय आपको अपनी जगह से उठने नही देगा। इरफान खान और आशुतोष राणा ने रणविजय और गौरीशंकर के रोल में खुद को परफेक्ट साबित किया है । कथानक इलाहबाद के आस पास घूमता है और वहा कि स्थानीय भाषा का प्रयोग बडे करीने से किया गया है। उदाहरण देखिए गौरीशंकर - और सुनो रणविजय इलेक्शन तक इधर तुम्हारी परछाई भी नही चाहिऐ नही तो॥ रणविजय -तो ...तो का होगा... गौरीशंकर - नही तो कम कर दिए जाओगे ,दो चार लौंडे आके गाना गयेगे चलते चलते मेरे गीत याद रखना ..दो मिनट का मौन होगा और का...तुम्हरी याद में नेशनल हलिदे होगा का बे... इरफान हर सीन मी कमाल है जब भी आये बस छ गए। कहानी कोई आर्ट सिनेमा नही है लेकिन हाँ इसे कमार्सिअल भी नही कहेगे बस यू कहिये कि तिग्मांशु में इंटरवल से पहले छात्र राजनीती और विधानसभा कि गलियों के बिच कैमरे को रखकर छोड़ दिया है और जो भी इसकी जड़ मी आया उसे बिना कट किये प्रस्तुतु किया है। यकीनन ऐसे मुद्दे काफी कम उठाए गए है और इन पर अभी और कम करने किजरुरत है । यह फिल्म समस्या को तो बताती है लेकिन कोई समाधान नही पेस करती है। कालेज एक हर युवा के जीवन का वह समय होता है जब वह पहली बार आज़ादी पता हिया अपने आसपास मी घुलना शुरू करता है। उसके पास साड़ी दुनिया को जितने ki ताकत होती है । लेकिन इन सबके लिए जरुरी है उसका सही दिशा बढ़ना और सही लोगो को हासिल करना । फिल्म का सर यही है। और अभिमन्यु से बेहतर भला इसे कौन जन सकता है जिसकी एक गलती ने उसकी जिन्दगी ki पटरी ही पलट दी। हासिल में भले ही रणविजय को कुछ न हासिल होता हो। लेकिन इतना तो यह फिल्म कह ही जाती है ki अगर जल्दी ही सबकुछ बदलेगा नही तो वो दिन भी दूर नही जब गौरीशंकर और रणविजय के पास सबकुछ होगा और हमारे हिस्से में कुछ नही ।
मंगलवार, 6 नवंबर 2007
सिनेमा - समकालीन सामाजिक दस्तावेज
हर दौर में समाज अपने लिए नए कायदे कानून बनता है , जिन पर सामाजिक मूल्यों व परम्पराओ का बोझ टिका होता है। ये परम्पराये 'सर्वमान्य' होकर भी 'सर्व्हित' में नही होती। इसलिए चंद फसलों पर ऊँची इमारतों और टूटी झोपडियों के पाए जाने का विरोधाभास पनपता है.जब दो विरोधाभास आपस में टकराते है तो ऐतिहासिक घटनाओ का जन्म होता है.और ये घटनाये ही इतिहास को जन्म देती है। साहित्य इस इतिहास को ज्यों का त्यों पन्नों में संभालता रहता है।
भारतीय समाज कि सरंचना अत्यंत जटिल है। यह बहुभाषी, बहु धर्मी, धर्म निरपेक्ष राष्ट्र अपने सीने में न जाने कितने झाख्म छुपाये है। गुजरात से मणिपुर, कश्मीर से कन्याकुमारी तक न जाने कितनी जोड़ गांठे हुई है तब जाकर भारत 'एक' बना है। यहाँ तक कि यात्रा में इसकी आत्मा पर लगे झाख्मो कि लंबी फेहरिस्त है। धर्म के नम पर आम आदमी पर कितने जुल्म हुए इसकी गिनती नही। ब्राहमण वाद ने गरीब व दबे कुचले लोगो को हाशिये पर ला खाद किया। सदियों तक अछूत मंदिर कि चौखट के बाहर खडे हो कर पूछता रह उसे अछूत किसने बने है । भगवान ने या 'भगवन के भक्तो' ने ।
भारत में असगर अछूत होना पाप था तो गरीब होना अभिशाप । आर्थिक दृष्टि से निम्न तबके ने ज़मिदारो के शोषण को पीढ़ी दर पीढ़ी भोग। 'नारी' जिसे भारत माता का दर्जा दिया गया है, उसे 'धर्म' के चौखट कि भीतर बंद कर दिया गया, बाहर निकली तो सटी कर दी गयी। अपने अधिकार मांगे अपने फैसले किये तो बहाया के खिताब से नवाजी गयी। और भी न जाने क्या क्या.........
साहित्य ने ऐसे हर मुद्दे को गहरे से छुआ है। समाज के नंगे यथार्थ का चित्रण किताबो से निकलकर परदे पर आ गया। और सिनेमा समाज का दर्पण बन गया। साहित्य और समाज के इस गठजोड़ ने समाज के चेहरे पर चढ़े बदरंग मुखौटे को उतार फेका।
भारतीय समाज कि सरंचना अत्यंत जटिल है। यह बहुभाषी, बहु धर्मी, धर्म निरपेक्ष राष्ट्र अपने सीने में न जाने कितने झाख्म छुपाये है। गुजरात से मणिपुर, कश्मीर से कन्याकुमारी तक न जाने कितनी जोड़ गांठे हुई है तब जाकर भारत 'एक' बना है। यहाँ तक कि यात्रा में इसकी आत्मा पर लगे झाख्मो कि लंबी फेहरिस्त है। धर्म के नम पर आम आदमी पर कितने जुल्म हुए इसकी गिनती नही। ब्राहमण वाद ने गरीब व दबे कुचले लोगो को हाशिये पर ला खाद किया। सदियों तक अछूत मंदिर कि चौखट के बाहर खडे हो कर पूछता रह उसे अछूत किसने बने है । भगवान ने या 'भगवन के भक्तो' ने ।
भारत में असगर अछूत होना पाप था तो गरीब होना अभिशाप । आर्थिक दृष्टि से निम्न तबके ने ज़मिदारो के शोषण को पीढ़ी दर पीढ़ी भोग। 'नारी' जिसे भारत माता का दर्जा दिया गया है, उसे 'धर्म' के चौखट कि भीतर बंद कर दिया गया, बाहर निकली तो सटी कर दी गयी। अपने अधिकार मांगे अपने फैसले किये तो बहाया के खिताब से नवाजी गयी। और भी न जाने क्या क्या.........
साहित्य ने ऐसे हर मुद्दे को गहरे से छुआ है। समाज के नंगे यथार्थ का चित्रण किताबो से निकलकर परदे पर आ गया। और सिनेमा समाज का दर्पण बन गया। साहित्य और समाज के इस गठजोड़ ने समाज के चेहरे पर चढ़े बदरंग मुखौटे को उतार फेका।
शुक्रवार, 2 नवंबर 2007
सिनेमा-दृश्यों कि भाषा
सिनेमा के अदभुद संसार में आपका स्वागत है . यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ वास्तविकता यथार्थ से ज्यादा स्पस्ट नजर अति है। यहाँ शब्दों के मुलम्मे सिर्फ सच को छुपाने के लिए नहीं बल्कि उसे सामने लाने के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं। सिनेमा कि इस विशाल दुनिया में शामिल होने कि तमन्ना किसकी नही होती । ये और बात है कि हर कोई इसमे शामिल नही हो पता लेकिन हाँ सिनेमा हम सबकी जिन्दगी में किसी न किसी रुप में शामिल है। कभी आनंद बनकर कभी देवदास बनकर,कभी पाकीजा बनकर तो कभी ड्रीमगर्ल बनकर।
यू तो सिनेमा को कांच के रंगीन टुकडों को सहेजने वाला, सपनों का सौदागर, और ऐसी ही नाजाने कितनी उपाधियों से नवाजा गया है , लेकिन वास्तव में जिस तरह हर चीज के दो पहलू होते हैं सिनेमा के भी दो पहलू हैं। सिनेमा पर यह आरोप है कि उसने नयी पीढ़ी को अपने मोह पाश मी बांधकर गुमराह किया है तो ये भी नही भूलना चाहिऐ कि जब जब समाज में आदर्शो के कमी हुई है या सच का गला घोटा गया है सिनेमा सवार्धिक सशक्त माध्यम बनाकर सामने आया है। कर्मिशैल सिनेमा और अर्तिस्तिक सिनेमा का संगम सिनेमा को मात्र मनोरंजन कि भूल भुलैया से दूर लेजता है। अतीत में जहाँ एक तरफ सत्यजीत राय थे,गुरुदत्त,ऋत्विक घटक,बिमल राय,ऋषिकेश, और बी आर चोपडा,नासिर हुसैन, थे वही आज उसी परंपरा को आदित्य चोपडा,कारन जौहर,राकेश रौशन,और मनीष झा,मधुर भंडारकर,संजय लीला भंसाली, आगे बड़ा रहे हैं।
कुल मिलकर कम से कम शब्दों मी कहा जाये तो सिनेमा जादू की वह पिटारी हैं जिसे जिसने जिस मन से खोला,जिन आंखो से देखा,उसे उसके मन का मिल और उसने वही देखा जो उसने देखन चाह। जादू कि यह पिटारी हर शुक्रवार को खुलती है। और गली गली नुक्कड़ में फिल्मो के पोस्टर पढ़ने वाले लोग और हर सुबह टाकीज के शो कि तिमिंग देखने वाले हम लोग हर हफ्ते इंतजार करते हैं कि इस बार इस जादू कि पिटारी में क्या हैं ?
यू तो सिनेमा को कांच के रंगीन टुकडों को सहेजने वाला, सपनों का सौदागर, और ऐसी ही नाजाने कितनी उपाधियों से नवाजा गया है , लेकिन वास्तव में जिस तरह हर चीज के दो पहलू होते हैं सिनेमा के भी दो पहलू हैं। सिनेमा पर यह आरोप है कि उसने नयी पीढ़ी को अपने मोह पाश मी बांधकर गुमराह किया है तो ये भी नही भूलना चाहिऐ कि जब जब समाज में आदर्शो के कमी हुई है या सच का गला घोटा गया है सिनेमा सवार्धिक सशक्त माध्यम बनाकर सामने आया है। कर्मिशैल सिनेमा और अर्तिस्तिक सिनेमा का संगम सिनेमा को मात्र मनोरंजन कि भूल भुलैया से दूर लेजता है। अतीत में जहाँ एक तरफ सत्यजीत राय थे,गुरुदत्त,ऋत्विक घटक,बिमल राय,ऋषिकेश, और बी आर चोपडा,नासिर हुसैन, थे वही आज उसी परंपरा को आदित्य चोपडा,कारन जौहर,राकेश रौशन,और मनीष झा,मधुर भंडारकर,संजय लीला भंसाली, आगे बड़ा रहे हैं।
कुल मिलकर कम से कम शब्दों मी कहा जाये तो सिनेमा जादू की वह पिटारी हैं जिसे जिसने जिस मन से खोला,जिन आंखो से देखा,उसे उसके मन का मिल और उसने वही देखा जो उसने देखन चाह। जादू कि यह पिटारी हर शुक्रवार को खुलती है। और गली गली नुक्कड़ में फिल्मो के पोस्टर पढ़ने वाले लोग और हर सुबह टाकीज के शो कि तिमिंग देखने वाले हम लोग हर हफ्ते इंतजार करते हैं कि इस बार इस जादू कि पिटारी में क्या हैं ?
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