गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

इन द मूड फ़ार लव

लव स्टोरी तो आपने बहुत देखी और सुनी होगी लेकिन इस कहानी की बात ही कुछ और हॆ. हागकांग के निर्देशक ’ वांग कर वाई ’ द्वारा लिखित और निर्देशित यह फ़िल्म अपने बेह्तरीन संगीत और कॆमेरा के लिये भी जानी जाती हॆ. ’ युमेजी ’ की किलिंग OST TUNE और ’ क्रिस्टोफ़र डायल ’ का MOVING CAMERA  देखने वाले को एक अलग ही दुनियां मे ले जाता हॆ.

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कहानी की बात करे तो कुछ यु हॆ कि एक नयी बिल्डिंग मे दो नवविवाहित जोडे आकर रुकते हॆं. और बाद मे पता चलता हॆ कि फ़िल्म के नायक की पत्नी का फ़िल्म की नायिका के पति के साथ संबंध हॆ. दोनों को ये बात पता हॆ लेकिन वे एक दुसरे को बताते नहॆ हॆ. उल्टा ऐसे व्यव्हार करते हॆ. जैसे उन्हे कुछ नही पता. लेकिन आखिर कार एक मोड पर राज खुल जाता हॆ. सवाल ये हॆ कि अब क्या करे ? नायिका का पति काम से अक्सर काफ़ी दिनो के लिये बाहर रहता हॆ. नायिका नायक कि मद लेती हॆ कि जब उसका पति आयेगा तो वह उससे कैसे पूछेगी. नायक पति की भुमिका अदा करता हॆ. और उसकी मदद करता हॆ.

लेकिन यह नाटक खेलते खेलते दोनो एक दूसरे को पसंद करने लगते हॆ. लेकिन वो अपने अपने पार्ट्नर की तरह नही बनना चाहते. इस्लिये दोनो एक दुसरे से अलग रहने का फ़ैस्ला करते हॆ. और नायक शहर छोड्कर चला जाता हॆ.

in the mood for love २

वांग कर वाई , विजुअल आर्टिस्ट हॆ. उन्की फ़िल्मॊ मे रंगों का खूबसूरत प्रयोग देखने को मिलता हॆ. जहा उन्की ’ चुंगकिंग ए़क्स्प्रेस्स ’ मे लाल पीला और सफ़ेद र्ंगों की अधिकता हॆ व्हीं यहां पर लगभग सारी फ़िल्म मे लाल रंग छाया रहता हॆ. प्यार को प्रदर्शित करने कए लिये और कौन सा रंग चुना जा सकता हॆ ? फ़िल्म मे बहुत ज्यादा कॆरेक्टर नही हॆ, लेकिन कभी इसकी आवश्यकता भि महसूस नही होती. यही हाल लोकेशन का भी हॆ, ले देकर ४-५ जगहो पर पूरी फ़िल्म उतार ली गयी हॆ.

अपनी फ़िल्म मे इत्ने मे तो एक गाना भी नही बनता. खैर बालीवुड किइ बात अलग हॆ.

तो अगर आप लव स्टोरी देखना पसंद करते हॆ, खासकर वियोग वाली तो यह फ़िल्म आपके लिये हॆ. यकीन मानिये आप्को निराशा हाथ नही लगेगी. और अगर आप्ने आजतक कोई अच्छी लव स्टोरी नही देखी तब भी यह फ़िल्म आपके लिये हॆ. इसे ढूढ्ने मे थोडी मेहनत शायद आपको करनी पडे लेकिन फ़िर अच्छी चीजे बिना मेहनत के कहां मिल्ती हॆ.

चलते चलते आपको फ़िल्म के संगीत की एक झलक देते चले.

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

नाट वन लेस

इंडिया और चाइना मे कम से कम एक सम्स्या तो आम हॆ – ग्रामीण और शहरी जीवन की असमानता. इसकी एक बेहतरीन झलक आप चायनीज फ़िल्म डायरेक्टर ’ झॆंग यिमु ’ की इस फ़िल्म मे देख सकते हॆ.

not one less

कहानी कुछ इस तरह से हॆ कि सुदुर के एक गांव मे एक १३ साल की लड्की ’ वे मिंझी ’ सब्स्टीट्युट की तरह वहा के एक मात्र स्कूल मे कुछ दिन पढाने के लिये आती हॆ. उस पर जिम्मेदारी होती हॆ कि स्कूल से एक भी बच्चा कम न होने पाये. लेकिन यह इलाका इतना गरीब हॆ कि बच्चे किसी ना किसी वजह से स्कूल छोड देते हॆ. एक लड्का जब घर के खर्च चलने के लिये शहर चला जाता हॆ. तो वे मिंझी उसे किसी भी तरह से वापस स्कूल लाने की ठान लेती हॆ.

लेकिन जब वह लड्के को ढूढने शहर आती हॆ तब उसे यहा के कायदे कनूनो से दो चार होना पडता हॆ. ये और बात हॆ कि हर मुसीबत का सामना कर्ते हुये अन्तत: वह लड्के को ढूढ ही लेती हॆ. और वापसी मे उसके साथ मीडिया गाव मे आता हॆ, जिसे इससे पहले पता भी नही था कि उन्के शहरो से दूर कुछ ऐसे गाव ,स्कूल और बच्चे भी हॆ. जिनके पेट को उतना भी नसीब नही होता जितना कि वो फ़ेंक देते हॆं.

कहानी बहुत हि इमोशनल हॆ और सीधी साधी. बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात दर्शको तक पहुचाती हॆ. और सब्से बडी बात ये कि फ़िल्म के सारे ही कलाकार नये हॆ. और उन्मे से कई तो वास्तविक जीवन मे  भी वही लाइफ़ जी रहे थे जो कि फ़िल्म में.

अपने देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हॆं , ऐसे मे इस फ़िल्म को एक बार देखने कि गुजारिश मॆं सब्से करुगा.

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

एनीमेशन - फिल्मो की नयी दुनिया

भले ही अभी भारत में एनीमेशन फिल्मे ज्यादा सफलता ना पा सकी हों लेकिन एशियन देस्हू और अंगरेजी सिनेमा कई पड़ाव पार कर चुका है. एक नजर एनीमेशन फिल्मो के बाज़ार पर , देखे क्या है नया रोचक और बेहतर.