बुधवार, 23 अप्रैल 2008

कला सिनेमा और व्यवयसायिक सिनेमा

अक्सर हिन्दी सिनेमा को लेकर यह बहस होती रहती है कि आखिर हमे कला फ़िल्मे क्यु बनानी चाहिये और जवाब मिलता है कि ताकि समाज कि सही तस्वीर लोगो के सामने रखी जा सके जो कि आज का कमर्सिअल सिनेमा नही कर रहा.वह मात्र पैसा कूटने मे मग्न है. बात देखी जाये तो सही भी है.लेकिन फ़िर सवाल उठता है कि कला सिनेमा हि कौन सा समाज का भला किये दे रहा है.फ़िल्मे तो बनती है लेकिन कोइ देखता हि नही.बहाने हजार है इस्के पीछे, कोइ कहता है भाई लोग देखने ही नही आते,लोग सिनेमा को मात्र नाच गाने का माध्यम ही समझते है. फ़िल्म्कार कहते है कोइ पैसा लगाने को ही तैयार नही.और भी ना जाने क्या क्या. अब इसमे कित्ना दूध है कितना पानी.ये तो वही लोग जाने.लेकिन जो जड़ से जुड़ा सवाल है वो यह कि भाई सिनेमा कोइ दो चार रुपये मे चलेने वली किराने कि दुकान नही है,एक फ़िल्म देखने और भूल्ने मे भले ही२-४ दिनो से ज्यादा न लगे लेकिन उसे बनाने मे सालो लग जते है.कुल मिलाकर यह वह कला है जो सबसे ज्यादा मह्गी है और सबकी चहेती है.इस्लिये सबसे पहली बात तो यही है कि अगर तुम्हरी फ़िल्म को लोग देखने ही नही आ रहे है और वह देश से बाहर पुरस्कार पे पुरस्कार जेत रही है.बडी बडी मैगजीनो पे जगह पा रही है,यानी कि आम आदमी पर बनी फ़िल्म खास लोगो के लिये आयोजित खास शो मे केवल दिखायी जा रही है. तो ऐसी कला फ़िल्म के क्या मायने.आखिर अगर कुवे को खोदने वाले को ही उसका पानी ना मिले तो लाख दुनिया भर से कहो अहा! कितना मीठा पानी है उस्के लिये तो खारा हि रहेगा ना.ऐसे मे अगर आम आदमी अपनी प्यास बुझाने के लिये कमर्शियल सिनेमा की तरफ़ मुह उठाता है तो क्या बुराई है.इसका मतलब ये नही कि कला सिनेमा बनना ही नही चाहिये मतलब यह है कि हमे उसे बदलना चाहिये.अगर हर रूह तक सन्देश नही पहुच रहा है तो हमे अपनी आवाज ऊची करनी चाहिये ना कि सुननए वलो से यह उम्मीद कि वो नजदीक आये.आखिर्कार हम वही कर सकते है जो हमारे हाथ मे है.क्यु ना कुछ ऐसा किया जाये कि कोइ बीच से रास्ता निकाला जाये.एक बार ही सही लोगो को जरा स्वाद तो चखने दो क्या पता अगली बार सिनेमा एक कदम चले तो वे दो कदम आगे आ जाये.इस समय हम हर दिशा मे आगे जा रहे है केवल सिनेम ही है जिसकी गति उम्मीद से पीछे है, हमसे कही छोटे छोटे देश मीलो आगे निकल गये है. यहा तक कि ईरान जैसे देश ने भी विश्व सिनेमा जगत मे अपनी अलग पहचान बनयी है.और एक हम है कि इस तेज रफ़्तार दौड मे घिसट घिसट कर बढ रहे है.